सीपीएम की क्रांति

सीपीएम की क्रांति
हम एक लोकतंत्र में रह रहे हैं! 14 मार्च को हुई घटना और उसके बाद सीपीएम के बंद के दौरान गायब हुए दो सौ लोगों का अब तक कोई अता-पता नहीं है्. हां। कुछ लाशें हैं जो इलाके में इस हालत में पायी गयी हैं. क्या हम बता सकते हैं कि इन्होंने किस बात की कीमत चुकायी? क्या हम इसको लेकर आश्वस्त रह सकते हं कि हमें भी कभी ऐसी ही कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी?

Sunday, March 25, 2007

Massacre trauma takes its toll

The Telegraph.

Tamluk, March 24: Forty-eight-year-old Sarifa Bibi cries like a child whenever she hears a noise.

Lying at the Tamluk district hospital, she hasn’t had a good night’s sleep since March 14. The minute she closes her eyes, she is swept back to that bloody day — bombs exploding at her feet, lathis raining on her and fear-stricken villagers running helter-skelter.

A resident of Jalpai village, about 10 km from Bhangabera, Sarifa had been part of the wall of protesters who tried to resist the police in Nandigram.

“When I recovered my senses at the hospital, I could not hear anything. My hearing improved gradually, but there is always a ringing sound in my ears. Whenever there is a noise, my heart starts to beat faster, I think another bomb has exploded,” she says, tears streaming down her tired face.

Satyabala Mondal, too, bore the brunt of the police batons. But her scars are deeper than what her bruises betray. The 45-year-old resident of Gokulnagar had fallen into a hole while running from the police.

Satyabala has had only nightmares since then. “Whenever I sleep, I dream of villagers being chased by gun-wielding policemen and a boy lying in a pool of blood.”

According to Sabitendra Patra, the superintendent of the Tamluk hospital, people like Sarifa and Satyabala may not be seriously injured but trauma has taken a toll on their minds.

“They can’t be released from hospital as they are still suffering from severe trauma. We have had to seek psychiatric help for them,” he said.

What has added to the hospital’s headache is the constant stream of VIP visitors and sympathisers, who won’t let the patients forget the firing. Every day, politicians and NGO representatives come to the hospital to listen to their “tales of horror”.

“Through their waking hours, the patients are being asked to relive the March 14 nightmare. The women face embarrassing questions like whether they had been raped or molested. As a result, the patients’ nerves are ruffled and their rest and sleep disturbed,” said S.N. Baur, one of two psychiatrists at the hospital.

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नंदीग्राम पर नयी फ़िल्म

यह फ़िल्म 14 मार्च की घटनाओं के सूक्ष्म विवरण के साथ आयी है.

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नंदीग्राम में 100 से ज्यादा लोग मारे गये हैं, 200 अब भी लापता हैं. वहां महिलाओं के साथ सीपीएम के कैडरों ने बलात्कार किया. बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया है. सीपीएम की इस क्रूरता और निर्लज्जता का विरोध होना चाहिए. हमें नंदीग्राम, सिंगूर और हर उस जगह के किसानों के आंदोलन का समर्थन करना चाहिए, जो अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. यह दस्तावेज़ी फ़िल्म किसानों के इसी संघर्ष के बारे में है. यह फ़िल्म नंदीग्राम के ताज़ा नरसंहार से पहले बनायी गयी थी.

नंदीग्राम में जनसंहार के बाद के द्श्‍य

यह फिल्‍म पुलिस द्वारा नंदीग्राम में बर्बर तरीके से की गयी हत्‍याओं एवं उनकी भयावहता व बर्बरता के बारे में है. इसके कई दृ़श्‍य विचलित कर देनेवाले हैं.

नंदीग्राम प्रतिरोध्‍

नंदीग्राम में सरकारी आतंक

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नंदीग्राम में सीपीएम सरकार की पुलिस ने जो बर्बर कार्रवाई की, वह अब खुल कर सामने आने लगी है. यह फ़िल्म उसी बर्बरता के बारे में है. इसके कई दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं. आप इसे तभी देखें जब आप वीभत्स दृश्य देख सकने की क्षमता रखते हों. हम खुद शर्मिंदा हैं कि हमें ऐसे दृश्य आपको दिखाने पड़ रहे हैं, पर ये आज की हकीकत हैं. इनसे कैसे मुंह मोडा़ जा सकता है?